समाजिक जीवन जीने की धारणा व परिभाषा आज के युग मे इंसान द्वारा अपनी जरूरत के अनुसार ' ट्रांसफॉर्म' व 'रेडिफाइन' की जा रही है। खुद से लाइफ इतनी फारवर्ड कर चुके है कि कोई भी कृत्य करने से पहले सोचने समझने व उस कृत्य के चलते खुद पर, खुद के परिवार पर व जिसके साथ किया जा रहा है-का असर क्या होगा वह सोचने में असक्षम बन चुके है। और खास तौर पर सोशल मीडिया के युग मे जहां मात्र एक रिकॉर्डिंग और क्लिक से किसी भी घटना को एक के हाथों से हज़ारों लोगों के 'व्यूज' तक पहुँचाया जा सकता है, उसने उस घटना के रचयिता को पीड़ित मानना आसान बनता जा रहा है और हम भी अक्सर ही उन अंधी भीड़ में शामिल हो जाते है जो घटना में 'क्रेडिबिलिटी' के शब्द को नज़रंदाज़ कर एक घटना को भेजने वाले अथवा लिखने वाले व कहने वाले के नज़रिए से सोचने लग जाते है कि "वह कह रहा है तो उसके साथ यह व्यथा घटी होगी" और उसके बाद आरोप प्रत्यारोप के खेल में हम भी अपनी प्रतिक्रिया न्यायालय से सर्वोपरि समझने लगे जाते है। और अगर यह आरोप कोई महिला लगाये तब तो समाज मे हर कोई महिला पक्ष में सबसे पहले खड़ा नज़र आता है फिर चाहे सामने वाला निर्दोष क्यों न हो। मैं यह नही कहता कि महिला गलत है या आज की नारी अपराध का शिकार नही है, बिल्कुल है और वह न्याय का अधिकार रखती है। किंतु वह जो अपना 'महिलाओं को कानून में खास अधिकार' का हवाला देकर कानून को अपने फायदे अनुसार मोड़ने की कोशिश में रहती है वह भूल जाती है न्याय देर से ही सही किन्तु 'सबके लिए समान है' - इररेस्पेक्टिव ऑफ जेंडर!!
गहराईयों में जाकर देखे तो आज का ट्रेंड कह लो कि रिश्तों, नाम, पद, दोस्ती हर चीज में इंसान फायदे देखता है। मैंने तेरे लिए यह किया तूने मेरे लिए क्या किया। और किसी का खास हाथ सिर पर हो तो वक़्त आने पर उस हाथ को झटककर नीचे खींचने में भी गुरेज नही करते। दोस्ती से जब इंसान फायदे ढूंढने लगता है तो वह वक़्त के साथ घातक हो जाता है।और जब खुद की इच्छा प्रबल कर लेता है कि इससे फायदा लेना है- तो वह कोई न कोई ऐसा रास्ता चुनता है जिससे सामने वाले की गरिमा को नुकसान पहुँचाना तय है। अपने फायदे के लिए दूसरे को 'सबक सिखाने' व बदला लेने की कार्यवाही में इंसान छींटाकशी पर भी उतर आता है, फिर चाहे उसके एक दो छींटे खुद के दामन पर क्यों न गिरे पर इरादा पक्का है कि सामने वाले से बदला लेना जरूरी है- तो वह खुद के लिए समाज के लिए हानिकारक है। झूठ का सहारा लेकर सीढ़ी चढ़ने पर जब खुद के फिसलने की बारी आती है तो पुलिस में झूठी शिकायत करना भी आजकल आम बात है और "यह तो हमारा कानूनी अधिकार है" कहकर आरोप लिखना व लगाना आसान लगता है। वह व्यक्ति आरोप-प्रत्यारोप के फेर में इस कदर घिर जाता है कि भूल जाता है कि आरोप- प्रत्यारोप की जुबानी जंग के बाद इल्जाम सिद्ध करने को न्याय के दरबार मे हाज़िरी जरूरी है- और वह रास्ता उसने खुद चुना है। और जब न्याय आता है तो खुद की गलती पर पछताने के सिवा कुछ नही बचता। बचता है तो सामने वाले के साथ किये गए अपने रिश्ते खराब व खुद की आत्मग्लानि।
