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नियम की अनदेखी पर सजा सबको बराबर

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नियम की अनदेखी पर सजा सबको बराबर

shikhrokiawaaz.com

02/05/2026


देहरादून-:   हमारे समाज के प्रशासनिक व सरकारी कार्यों में एक चलन बहुत आम है कि जो व्यक्ति 'नियम, कानून को सर्वोपरि रख' कॉमपेटेंस व एक्यूरेसी के संग हर कार्य मे दक्षता के मानक को लगातार बढ़ाता चला जाता है और अपने अधीनस्थों व सहकर्मियो से भी समाज मे बदलाव को उस नीति का प्रेणता बनने का आवाहन करता है, वह व्यक्ति  "नाकाम व अपने आपको सही साबित करने को दूसरों तक को नीचे गिराने का प्रयास करने वालों" की नज़रों में तिनके सा चुभता है, जिसके फलस्वरूप वह उस व्यक्ति को हर स्तर से नीचा गिराने में गुरेज नही करता। ऐसा ही मामला राजधानी देहरादून के सबसे कुशल प्रशासको में से एक, अपने शांत,सहज किन्तु सक्रिय, ईमानदार व अपनी काबिलियत से राजधानी देहरादून में हर एक पीड़ित की " उम्मीद" बने डीएम सविन बंसल के साथ भी देखने को मिल रहा है। जहां एक महिला अधिकारी द्वारा डीएम सविन बंसल पर उनके उत्पीड़न के आरोप लगाये गए है और उस बाबत उनके द्वारा वरिष्ठ अधिकारियों व शासन को भी शिकायत प्रेषित करने की बात भी सामने आ रही है। महिला अधिकारी द्वारा डीएम सविन बंसल के विरुद्ध शिकायत का मामला सामने आने के बाद से ही सोशल मीडिया में महिला अधिकारी के विरुद्ध कड़ी प्रतिक्रिया सामने आयी है, साथ ही डीएम के समर्थन में भारी जनसमर्थन भी खड़ा हो गया है। 


सरकारी पद पाने के जब सब बराबर के अधिकारी है तो किन नियमो में लिखा है कि किसी वरिष्ठ अधिकारी की सरकारी कार्य के प्रति उदासीनता उसको उत्तरदायी नही बनाएगी खास तौर पर जब वह महिला अधिकारी है। और जब अधिकारी डीएम सविन बंसल सा 'कार्यकुशल' हो तो वह अधिकारी की लापरवाही व अति आवश्यक कार्यो के प्रति 'नेगलिजेंस' जैसी गलती में महिला पुरुष का भेद तो बिल्कुल नही करेगा। महिलाओं को आज हर सुविधा है- रात को देर तक काम नही करवाया जाता, मैटरनिटी लीव है,कई स्तर और एक्स्ट्रा प्रिविलेज है, तो ऐसे में जब नियमो व जिम्मेदारी को निभाने की बारी आती है तो वह महिला पुरूष के लिए बराबर होने चाहिए और उनका उल्लंघन करने पर कार्यवाही का हकदार अकेला पुरुष अधिकारी क्यों? महिला अधिकारी को पद का जिम्मा मिला है तो उसके शत-प्रतिशत निर्वहन का दायित्व उसके सिर है और दायित्व अधूरा रहने पर कार्यवाही का जिम्मा भी उसके सिर बराबर होना चाहिए। डीएम सविन द्वारा अपने अधीनस्थ हर अधिकारी व कर्मी चाहे वह ए क्लास अफसर हो या चतुर्थ श्रेणी कर्मी हर किसी को उनके सिर बंधे जिम्मे को हर सूरत में निभाने को प्रतिबद्ध होने का आवाहन व निर्देशित किया है, और उसके अनुपालन में कड़ी कार्यवाही अमल में लाई जाती है तो वह सिस्टम में सुधार का घोतक है न कि उत्पीड़न का उदाहरण। और उन अधिकारियो के रवैये को स्वपरीक्षण की जरूरत है कि कार्य मे जब खुद की न चले तो गलती स्वीकार करनी चाहिए न की दोष मढ़ने की तैयारियां।

वहीं उत्तराखंड़ की शांत वादियों में लगातार बढ़ते अपराधों व लॉ एंड आर्डर को ताक पर रखने वालों की तादाद बढ़ जाना चिंता का विषय है। पुलिस बल अपने सक्रियता के दावों के बावजूद अपराधियो के हौसले बुलंद है व खुलेआम अपराध करने से गुरेज नही कर रहे। आलम यह है कि पीड़ितों द्वारा पुलिस अधिकारियों से अपनी पीड़ा बताई जा रही है, किन्तु उसपर पुलिस कार्यवाही नही करता। खासतौर पर महिलाओं से जुडे मामलों में पुलिस का रुख ज़्यादा उदासीन है, जोकि प्रदेश में खासतौर पर राजधानी की शांत वादियों में महिलाओ की सुरक्षा पर बड़े सवाल खड़े कर रहा है। हाल ही में राजधानी में विकासनगर, ऋषिकेश व इसी हफ्ते घंटाघर के मच्छी बाजार में सारे आम एक युवती का गला काटने की सनसनीखेज घटना से राजधानी में महिलाओं की सुरक्षा पर सवालिया निशान लगाए है व आम जनता लगातार पुलिस से सवाल कर रही है- महिलाओं के खिलाफ अपराध बढ़ रहे है, आखिर पुलिस सोई क्यों है? वहीं हरिद्वार के ज्वालापुर में भी रविदास जयन्ती पर भी दो गुटों में खूनी संघर्ष के चलते दो लोगो को जान गवानी पड़ी। रिवाल्वर कल्चर हर दिन किसी न किसी शहर में कानून को मुंह चिड़ा रहा है और लॉ एंड आर्डर बनाये रखने वाले कार्यवाही में सीमित बने हुए है,क्यों? सिस्टम में उपज रही यह लापरवाह अधिकारियों के खिलाफ उत्तराखंड़ डीजीपी द्वारा कड़ी प्रतिक्रिया देते हुए इन घटनाओं में अप्रत्यक्ष रूप से जिम्मेदारी 3 पुलिस अधिकारियों को निलंबित कर सिस्टम में लापरवाह अधिकारियों व कर्मियों को काम न करने व जिम्मेदारी से पल्ला झाड़ने पर क्या कार्यवाही हो सकती है का सटीक उदाहरण दिया है। अधिकारियों द्वारा उनके खिलाफ निलबंन कार्यवाही स्पष्ट रूप से पुलिस कर्मियों के लिए सबक है कि उनकी जरा सी गलती पर उन्हें कितनी जिल्लत झेलनी पड़ जाती है और समाज को सजा।
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